चौदह जनवरी २०१२ को बीरगंज (नेपाल) के वाणिज्य संघ सभागार में नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद्, वीरगंज ने विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर बाल हिन्दी कविता प्रतियोगिता का आयोजन किया। एक समारोह के रूप में आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि नेपाली काँग्रेस के सभासद श्री ओमप्रकाश शर्मा थें। कार्यक्रम की अध्यक्षता परिषद् के अध्यक्ष ओमप्रकाश सिकरिया ने तथा कार्यक्रम का संचालन कुमार सचिदानंद सिंह ने किया। त्रिसदस्यीय निर्णायक मंडल में के.सी.टी.सी. महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष डाँ.हरीन्द्र हिमकर, कवि गोपाल अश्क एवं ठा.रा.ब. क्याम्पस की हिन्दी विभाग की उप-प्राध्यापक डा .गीता कुमारी थीं। बच्चों में हिन्दी लेखन के प्रति प्रोत्साहन जागृत करने के उद्देश्य से इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने एक स्वर से हिन्दी के अन्तराष्ट्रीय स्वरूप विकसित होने की बात स्वीकार की और यह भी कहा कि हिन्दी हमारी संस्कृति की भाषा है। राजनैतिक रूप से इसे विवादों में नहीं घसीटा जाना चाहिए। इस प्रतियोगिता में बीस विद्यालयों के पच्चीस छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया जिसमें 'चिड़ीया', 'सवेरा' और 'पहाड़' शीर्षक निर्धारित किए गए थें। डी.ए.वी.आर.वी. केडिया स्कूल वीरगंज की दसवीं कक्षा की छात्रा सुकृति सिंह ने 'चिड़ीया' शीर्षक कविता के आधार पर प्रथम, पशुपति शिक्षा मन्दिर की छात्रा निकिता ने द्वितीय और त्रिभुवन-हनुमान माध्यमिक विद्यालय के छात्र कृष्ण कुमार श्रीवास्तव ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। इन दों की कविता का शीर्षक 'सवेरा' था। इनके अतिरिक्त विश्व हिन्दी संस्कृति विद्यापीठ की नीलम कुमारी गुप्ता, पशुपति शिक्षा मन्दिर की दिव्या अग्रवाल और त्रिभुवन हनुमान माध्यमिक विद्यालय की सीमा कर्ण नें सान्त्वना पुरस्कार प्राप्त किए। इसके साथ ही स्थानीय डी.ए.वी.के छात्र सुधांशु शेखर एवं सेंटजेवियर के छात्र सुधांशु सौरभ ने स्तरीय कविता वाचन किया जिसकी प्रशंसा निणायक मंडल ने भी की लेकिन परिषद् परिवार से जुड़े होने के कारण इनकी रचनाएँ प्रतियोगिता में शामिल नहीं थी। कार्यक्रम में नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद के संस्थापक दीप नारायण मिश्र, भारतीय महावाणिज्य दूतावास के पी.डी. देशपांडे, पी. शशी, पूर्व मंत्री सुरेन्द्र प्रसाद चौधरी, सद्भावना पार्टी के निजामुद्दीन समानी, समाजसेवी विनय यादव, मारिसस से आए आचार्य उमानाथ शास्त्री भी उपस्थित थें|
Friday, January 27, 2012
Thursday, May 26, 2011
वीरगंज में बुद्ध-जयन्ती
१७ मई २०११ को स्थानीय उद्योग वाणिज्य संघ के सभागार में नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद् ने महात्मा बुद्ध की २५५५ वीं वर्षाँठ भव्यता से मनायी । इस अवसर पर परिषद् ने एक विचार गोष्ठी सह कवि सम्मेलन का आयोजन किया । इस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि स्थानीय वरिष्ठ उद्योगपति, समाजसेवी एवं हिन्दी अनुरागी श्री जगदीश अग्रवाल थे जबकि अध्यक्षता परिषद् के अध्यक्ष श्री ओमप्रकाश सिकारिया ने की । कार्यक्रम में अन्य उपस्थित अतिथि वीरगंज बौद्ध समाज के वीरहर्षशाक्य, ब्रह्मकुमारी राजयोग सेवा-केन्द्र की प्रमुख रबीना दीदी, वयोवृद्ध साहित्यकार पं. दीपनारायण मिश्र, प्राध्यापक डा. विश्वम्भर कुमार शर्मा आदि थे। धर्म, अध्यात्म एवं ज्ञान के क्षेत्र से जुड़े इन लोगों ने अपने बहुमूल्य विचार अभिव्यक्त किए तथा मौजूदा समय में बुद्ध की सत्य-अहिंसा के सिद्धान्त की प्रासंगिकता बतलायी । यस अवसर पर श्री अग्रवाल ने अपने मंतव्य में कहा कि बुद्ध के चिंतन में उच्च कोटि का प्रबन्धन दृष्टिगत होता है । श्री सिकरिया ने अपने अध्यक्षीय भाषण में बुद्ध के जीवन और चिन्तन पर प्रकाश डाला और कहा कि लौकिक विषयों पर लिखना सरल है लेकिन परमार्थ एवम गुढ विषयों पर अभिव्यक्ति कठिन है, लेकिन बौद्ध दर्शन में हिन्दी साहित्य अत्यंत समृद्ध है.।
इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन में र्सवश्री लाला माधवेन्द्र, मुकुन्द आचार्य, जवाहर रौनियार, सतीशचन्द्र झा सजल, इन्द्र रंजित तनाका, देवनारायण यादव आदि कवियों ने काव्य पाठ किया । कार्यक्रम का संचालन कुमार सच्चिदानन्द ने किया । इस कार्यक्रम के माध्यम से परिषद् ने हिन्दी के प्रति आम लोगों की सोयी संवेदना को जगाने का प्रयास किया ।
Tuesday, March 10, 2009
बाल-कविता प्रतियोगिता आयोजित
बीरगंज १० जनवरी । विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य मे नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद् वीरगंज नें बाल-कविता प्रतियोगिता का आयोजन किया जिसमें विभिन्न सरकारी तथा गैरसरकारी विद्यालयों के बच्चों ने सहोत्साह भाग लिया । इस प्रतियोगिता के लिए परिषद् ने "हिमालय" और "बचपन" दो शीर्षक दिये थे। इस प्रतियोगिता में सुरम्या शुभम ने "बचपन", राजेश्वरी चौधरी ने "हिमालय" और समशुल हक समानी ने "बचपन" शीर्षक कविता प्रस्तुत कर क्रमशः प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय पुरस्कार प्राप्त किए, जबकि सान्त्वना पुरस्कार प्राप्त करने वालो में नितिश कुमार तुलस्यान, सन्तोष ठाकुर, शिवानी शाह, सुनीता कुमारी ठाकुर और आनन्द कुमार गुप्ता थें । प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वालों के लिए परिषद् ने १००१, ७०१ तथा ५०१ की राशि के साथ हिन्दी साहित्य कि कुछ पुस्तकें प्रदान किया गया।
यह कार्यक्रम हिन्दी साहित्य परिषद् के अध्यक्ष श्री ओम प्रकाश सिकरिया की अध्यक्षता और संविधान सभा सदस्य श्री अजय चौरसिया के प्रमुख आतिथ्य में सम्पन्न हुआ । श्री चौरसिया ने प्रतिभागियो तथा उपस्थित सहृदयो को सम्बोधित करते हुए एक ओर तो बच्चो को प्रोत्साहित किया दूसरी ओर यह भी कहा कि आज देश में चारो ओर अराजकता कि स्थिति है इसके बावजुद इस तरह का साहित्यिक कार्यक्रम सन्तोष प्रदान करते हैं । धन्यवाद ज्ञापन करते हुए परिषद् के अध्यक्ष श्री सिकरिया जी ने कहा कि इस तरह के आयोजन बच्चो कि सृजनशीलता को बढावा देने के लिए महत्वपुर्ण हैं और भविष्य में भी ऐसे आयोजन करने की प्रतिवद्धता जतलाई । इस कार्यक्रमका सफल सञ्चालन प्रख्यात भोजपुरी, नेपाली एवं हिन्दी कवि गोपाल अश्क ने किया तथा कार्यक्रमका संयोजन कुमार सचिदानन्द के द्वारा हुआ ।
बचपन
(सुरम्या शुभम् -दिल्ली पब्लिक स्कूल, कक्षा १०)
(हिन्दी बाल-कविता प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त रचना)
प्रफुल्लित हृदय है धरा का
और आ“खे रत्नारी
तरुवर झूम उठे मगन
किसलय ने मारी किलकारी ।
बादल घनेरे छाए है
रिमझिम फुहार है आई
पंख पसार नाच रहा मयूर
बचपन तेरी याद आई
नन्हे से बचपन की
आशायें भी नन्हीं थी
सारी दुनिया का निचोड
दादी और मम्मी का आंचल
बचपन कहु या गुलाब
दोनो लगता एक सा प्यारा
तितलियों को अपना कहूं
या परियो की कल्पना करे
दोनों ने मेरे बचपन को संवारा ।
कल की ही बात थी, जब
घूमती थी दादा जी की उंगली पकड,
कच्चे आम अमरुद जब तोडती
देते मेरे कान रगड ।
रोती - रोती मैं दादी की गोद मे समाती
उनकी शिकायत उनसे सुनाती ।
दादी मुझको चुप कराती
दादाजी को डांट पिलाती
सुन राहत मुझको आती ।
आज दादा का प्यार नही और दादी का दुलार नही
बचपन छूटा, वो भी छुटे, सहा जाता यह आघात नहीं ।
बचपन की हरियाली में
फूल हमारे परिजन थे
रंग-बिरंगी तितलियां हम सब
हंसता मेरे वन-उपवन थे ।
कैसे लिखूं मैं ये अनगिनत शब्द अनमोल
इस हृदय में बसे जाने कितने, मासूम मधुर बोल ।
हे विधाता १ दे दे मेरे पदों मे बचपन घोल ।
बचपन छुपा रहता है
हर इंसान के अन्तरमन में
प्रौढता ओढ बैठे रहते सब
पर जीता मन के कोमलत्तम में ।
गौरया के संग फुदकती, कबुतर को दाना चुगाती
कोयल संग कू कू करती, कटी पतंग देख चिल्लाती
फागुन की लाली से रंगित
बर्षा की बूंदे किलकारी और
कागज की नाव चलती देख, देती थी ताली
फिर क्यों कहते हो तुम मैं बचपन हूं हारी
रोम रोम मे भरा है बचपन
बचपन है मेरा सबसे प्यारा
किशोरवय अभिशाप नहीं जो
छीन ले मुझसे भोलापन सारा,
खण्ड-खण्ड हो मिट्टी में मिल कर
उग आउंगी बन गुलमोहर
बच्चों को लालीमा देकर
याद करुंगी गुजरा बचपन
पर सुनाऊं आपको बात एक दिन की
बिखरे बाल थरपराते होठ और
आंखो में आंसूओं की धार लिए
चल रहा था एक बचपन
बेबसी और लाचारी की मार लिए
तन की बांहो का घर लिए
भूखा पेट निस्तेज थी आंखे
दीनता का संसार लिए
फिर एक दिन -
ध्वनि पटी मेरे कानों में
काग की कर्कशता लिए,
चल धो बर्तन, लगा झाडू
उठ मैने देखा, उत्सुकता लिए
नन्हा बचपन था वह भी
निरक्षरता की मार लिए,
थर-थर कांप रहा था डर कर वह
झाडू व बर्तन हाथ लिए
मैं बिटिया आपकी, आप हमारे पालनहार
र्सार्थक कर दो इस बचपन को भी, आप है कुम्भकार ।
निश्छलता का नाम है बचपन
मासूमियत का पैगाम है बचपन
पाप - पुण्य से मुक्त रहे जो
वह प्रकृति का वरदान है बचपन ।
हिमालय
(राजेश्वरी चौधरी -त्रि-जुद्ध महावीर प्रसाद रघुविर राम मा विद्यालय, कक्षा १०)
(हिन्दी बाल-कविता प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार प्राप्त रचना)
कितना अच्छा है हिमालय
सबसे ऊंचा ऊंचा है
शिव गौरीका वास है यह
देखो इतना अच्छा है ।
प्रकृति का अनमोल वरदान है यह
देखो कितना अचल - अटल
इस धरती की शान हिमालय
संकट का अभिज्ञान हिमालय ।
देता शीतल पवन हिमालय
सबको मोहित कर लेता
शीतल जल का अगस्र स्रोत यह
धरती को जीवन देता ।
कितना रमणीय है हिमालय
हमारे लिए गर्व की गाथा
सूरज की पहली किरणों से
हीरे की तरह चमक उठता ।
जब भी देखूं हंसता रहतार्
दर्द प्रदर्शन नही करता
खुशियों की सौगात लुटाकर
जड जगम का जीवन दाता ।
बचपन
(समसुल हक समानी -त्रि-जुद्ध महावीर प्रसाद रघुविर राम मा विद्यालय, कक्षा १०)
(हिन्दी बाल-कविता प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार प्राप्त रचना)
कितना मासुम था वह बचपन मेरा,
याद आती है तो मुस्कुराता है मन मेरा ।
मां की ममता का मधुर छाव,
वे नन्हें - नन्हें हाथ पांव
दादी की वह मधुर लोरियां
मेरी नींद और किलकारियां
कितना सुनहरी था वह बचपन की शरारते,
आज भी है उनसे मेरी कुछ आदते ।
ओ दादा की अंगुलिया पकडकर चलना,
छोटी सी बातो पे रोना बिगडना ।
मेरी छोटी-छोटी गलतियों को
मुस्कुराकर नजर अन्दाज कर देना
और मुझे दुआवों भरे ढेर सारा प्यार देना ।
अपनी शरारतें से सबको हसाना,
बहुत याद आता है ओ गुजरा जमाना ।
ए काश मेरा वो बचपन लौट आए,
एक बार फिर से दादी मुझे लोरिया सुनाए ।
ना पर्ढाई कि चिन्ता ना परीक्षा कि गम,
सच कहे तो उस वक्त बहुत हि खुश थे हम ।
अपने ही दोस्तो से लडना झगडना,
जरा सी बातों पर ज्यादा बिगडना ।
बहुत याद आते है बचपन वे पल,
आज भी मचा देते है दिल मे हलचल ।।
बचपन
- नितेश कुमार तुलस्यान -पशुपति शिक्षा मन्दिर)
-हिन्दी बाल-कविता प्रतियोगिता में सान्त्वना पुरस्कार प्राप्त रचना)
बचपन के होते विविध रंग,
खेल कूद सब संग संग ।
हरपल हल लम्हा, एक नई उमंग,
दिल में रहती एक नई तरंग ।।
बचपन वो ऐसा श्याम रंग,
जिसमे पर चढता कोई रंग ।
बचपन आ“गन की किलकारी,
जिसे चाहती है दुनिया सारी ।।
बचपन न जाने रंग भेद,
बचपन न जाने श्याम श्वेत
बचपन न जाने जाति पाति,
बचपन न जाने पूण्य पाप ।।
बचपन ऐसी मीठी वाणी है
परिचित जिससे हर प्राणी है ।।
नए फूल खिले है बचपन में,
संजोए उसे हम निज मन में ।।
मा“ के आचल में गुजरती,
बचपन की शरारते सारी ।
तभी तो मा“ है कहलाती,
इस दुनिया में सब से प्यारी ।।
मुग्ध हो बच्चो के भोलेपन पर,
आसमान झुक जाता है
मोती रुपी बारिश को सिर्फ
उनके लिए बरसाता है ।।
मत रोको नन्हें हाथों को
आगे बढने से सतप्त,
जो तोडना जाहे अम्बर से
मीठे मानस फल महत ।
आजो हम सब मिलकर
अपने बचपन को याद करे,
हम सब आपस में मिलजुल कर
कुछ मीठी मीठी बात करें ।
हिमालय
- संतोष ठाकुर -पशुपति शिक्षा मन्दिर)
-हिन्दी बाल-कविता प्रतियोगिता में सान्त्वना पुरस्कार प्राप्त रचना)
जय हिमाल जय नेपाल
तेरी महिमा है महान
आज हिमाल की चोटी पर भोले ने कर दिया कमाल
आज पुजारी बदल बदल कर प्रचण्डने बनाया नया“ नेपाल
शिव शंकरको बन्धक रख कर फेका राजनीतिका जाल
देवी देवता खुश हो कैसे जहा“ विचार हो कंगाल
जहा“ सरकारकी रज्जत न होती प्रजा मे होता रोज बबाल
दैनिक लोड सेडिङ्ग का कारण सूख गए यहा“ के ताल
कल विश्वमें हिमाल का नाम लेते थे गर्व के साथ
पशुपतिनाथ जहा“ बसते हैं, वह है मेरा प्यारा हिमाल
बचपन
- शिवानी शाह -दिल्ली पब्लिक स्कूल, कक्षा ८)
-हिन्दी बाल-कविता प्रतियोगिता में सान्त्वना पुरस्कार प्राप्त रचना)
कुछ अन्जानी कुछ पहचानी,
याद आ रही मुझको फिर से ।
मेरे बचपन की एक कहानी,
जिसको सुना रही आज मै अपनी जुवानी ।।
बचपन मे थी मेरी आदत,
रोज कहानी सुनने की
जैसे ही मा“ थपकी देती,
मै मा“ से पूछ लेती ।।
क्या आज राज कुमार आएगा
कैसा होगा वह राज कुमार
फिर क्या होगा उसके वाद -
तब मा“ कहती -
रवि सा वह उज्जवल होगा,
सोम सा वह सुन्दर होगा
गुलाबों के फूलो सा वह कोमल
सफेद घोडा पर आएगा
और तुझे ले जाएगा
मैने उत्सुकता से पूछा
क्या मुझे ले जाएगा अपने साथ १
मा“ फिर क्या होगा उसके बाद -
फिर अंबर के ये नक्षत्र सुन्दर सुन्दर
एक-एक कर उतर-उतर
बारी-बारी से, तेरे शिशु बनकर
मेरे घर आए“गे उसेके बाद .............।
मेरे नए खिलौने लेकर
चले न जाए“ वे अपने घर
इस चिन्ता मे व्याकुल होकर
मै बिस्तर पर बैठ गई
और फिर झटके से निचे उतर गई
मा“ मेरे इरादे भा“पकर धीरे से मुस्काई
मै अपने बिखरे खिलौने समेटकर
अलमारी मे उनको रखकर, मा“ के साडी से ढककर
दौड कमरे का दरबाजा और खिडकिया बंद कर आई
अब - जब मै हो गई सयानी
सुनकर अपने बचपन की ये कहानी
मै थोडा-सी शरमाई, फिर धीरे से मुस्काई ।।
बचपन
- अनिता ठाकुर
-हिन्दी बाल-कविता प्रतियोगिता में सान्त्वना पुरस्कार प्राप्त रचना)
रुठते मनाते दिन गए बचपन जब मैं थी नादान ।
पढने लिखने स्कूल गई तो मिला गुरुजनों का प्यारा ।।
गुरु जनो की शिक्षा ने दिया मुझ में संस्कार
इसलिए उनको मैं करती कोटि कोटि प्रमाण ।।
मेरा बचपन कैसा था मै आज बताना चाहती ह“ू
आप सबके सामने मै प्रस्तुत करना चाहती हू“ ।
मेरे बचपन ठीक रहा बढ गई ममी, पापा का सामने ।
मेरी घर की खुुसी की खातिर पर््रार्थना की भगवान के सामने ।।
बहुत दिन बचपन रही और मैं हो गई स्वाभीमानी ।
सारे जीवन मे कभी हो ना मुझे परेशानी ।
बचपन की बात है जब मै ममी पापा से रुठ गई थी
उसी वक्त पापा आ गये जब मैं सो गई थी ।
बचपन मे मुझ से बहुत भूल हर्ुइ थी ।
भगवान को भी मुझसे तकलीफ न हर्ुइ थी ।
बचपन मे मेरा एक सपना था ।
पढ-लिख कर कोई काम करना यही भगवान से पर््रार्थना थी ।।
मेरे ममी पापा मुझे बहुत समझाते थे
कोई तकलीफ मे भी ओ मुझे नहीं रुलाते थे ।
र्स्वर्ग जैसा घर मेरा उसमे मै रहती थी हरदम
कभी इस घरको नजर न लगे मनाती थी हरदम ।
भगवान से मैं करती हू हरदम यही दुआ ।
मुझे बनादे जिन्दगी भर कामयाब ।।
इस भरी दुनिया मे करु मैं ऐसा काम ।
जिससे मेरे पापा का हो बहुत नाम ।।
बचपन
(आनन्द कुमार गुप्ता -श्री नृसिंह माध्यमिक विद्यालय, पिपरा)
(हिन्दी बाल-कविता प्रतियोगिता में सान्त्वना पुरस्कार प्राप्त रचना)
जन्म देती हैं माता
कर्म देते हैं पिता
शिक्षा देते हंै गुरु
तब पढना करते हैं शुरु
संस्कार से जीवन चलता है
तब जीवन र्स्वर्ग बनता है
कुसंस्कार से जीवन थमती
तब जीवन नही बनती है ।
हे ! माता पिता आपने मुझे जन्म दे कर
बडा आपने किया है, दूध भात खिलाकर
नमक रोटी आपने खायी
मुझे मखमल पर सुलाकर
अगर कहीं मुझे खरोंच आए तो
दर्द होता है आपको
जब मै सम्मान पाउ तो
फक्र होता है आपको
जन्म दिए है आपने तो
मुझे ना भुलाना
यदि भुला भी जाउं तो
याद करना मेरा गाना
हमारा रोना देखकर
माता भी रोने लगती है
हमारा दर्द देखकर
वह कुछ भी कर सकती है ।
पिता रात रात मिहनत करते
हमे बहुत पढाने के लिए
माता लोरी सुनाती है
हमे सुलाने के लिए
जन्म देती है मातार्
कर्म देती है पिता
शिक्षा देते है गुरु
तब पढना करते हैं शुरु ।
हिमालय
- निशिता कुमारी -दिल्ली पव्लिक स्कूल, कक्षा ८)
-हिन्दी बाल-कविता प्रतियोगिता में पुरस्कार प्राप्त रचना)
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पर्वत राज हिमालय, जिस पर शिव का रहा बसेरा
पार्वती का पिता जानकर, शिव ने डाला डेरा
मन मोहिनी प्रकृति ने, जिसका मन भावन रुप उकेरा
वो शैलराज है मेरा, वो शैलराज है मेरा ।
झर-झर झरते झरने, मानो गुणगान कर रहे है
नीख नभ के शांत हृदय को, रोमांचितदेर रहे है ।
उंचे-उंचे वृक्ष मानो, मौन निमन्त्रण दे रहे है,
कलख करते पक्षी उड-उड कर विहंस रहे है
इस लिए यस शैल शिरोमणि प्रभु का रहा बसेरा
ये शैलराज है मेरा, ये शैलराज है मेरा
हिम मंडित शैलराज मानो मणिं जडा मुकुट हो
लगता जैसे पार्वती साक्षात सामने खडी हो ।
यह अप्रतिम सौर्न्दर्य देखने, मौसम करता फिर-फिर फेरा
वो शैलराज है मेरा, वो शैलराज है मेरा ।
नदियां जहां से सुधा की धारा वहा रही है,
मानो अनेक रागों की स्वर-लहरी बजा रही है ।
ये निधियां हिमालय राज की, मन को हर्षा रही है,
ये अप्सराएं शैलराज की, इन्द्र की अप्सराओं को जला हरी है
फिर शैल शिरोमणि ने मानो, आनन्दोत्सव सा छेडा
वो शैलराज है मेरा, वो शैलराज है मेरा ।
Friday, September 26, 2008
पर्वतों की ओट में
जाने कब जाने का पैगाम आ जाए
- गोपाल अश्क
जाने कब जाने का पैगाम आ जाए
जिन्दगी की आखिरी शाम आ जाए
मत करो तुम दुश्मनी यहां किसी सो भी
क्या पता किस मोड पे कौन काम आ जाए
मत रुको चलते रहो चलना ही तो है सफर
क्या पता तुमसे मिलने खुद मुकाम आ जाए
मत देखो तुम राह जीने की जीते ही रहो
क्या पता कब मौत ही खुलेआम आ जाए
बच के रहो तुम यहां अपने ख्यालों से अश्क
क्या पता किस जुर्म में तेरा नाम आ जाए
लिखूंगा नव गीत लिखुंगा
-गोपाल अश्क
लिखूंगा, नव गीत लिखूंगा
वर्तमान और अतीत लिखूंगा
जहां चाहे जितना भी दर्द दे
पर हंसकर प्रीत लिखूंगा
क्या हारने की बातें करते हो
एक ना एक दिन जीत लिखूंगा
सागर में खोना नियति है
नदी की वफा-रित लिखूंगा
गम न करो अश्क अपनी भी
एक एक बात मीत लिखूंगा
- गोपाल अश्क
जाने कब जाने का पैगाम आ जाए
जिन्दगी की आखिरी शाम आ जाए
मत करो तुम दुश्मनी यहां किसी सो भी
क्या पता किस मोड पे कौन काम आ जाए
मत रुको चलते रहो चलना ही तो है सफर
क्या पता तुमसे मिलने खुद मुकाम आ जाए
मत देखो तुम राह जीने की जीते ही रहो
क्या पता कब मौत ही खुलेआम आ जाए
बच के रहो तुम यहां अपने ख्यालों से अश्क
क्या पता किस जुर्म में तेरा नाम आ जाए
लिखूंगा नव गीत लिखुंगा
-गोपाल अश्क
लिखूंगा, नव गीत लिखूंगा
वर्तमान और अतीत लिखूंगा
जहां चाहे जितना भी दर्द दे
पर हंसकर प्रीत लिखूंगा
क्या हारने की बातें करते हो
एक ना एक दिन जीत लिखूंगा
सागर में खोना नियति है
नदी की वफा-रित लिखूंगा
गम न करो अश्क अपनी भी
एक एक बात मीत लिखूंगा
Tuesday, August 12, 2008
नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद् द्वारा तुलसी जयंती मनाई गई
बीरगंज (नेपाल) ८ अगस्त । आज तुलसी जयंती के पावन अवसर पर नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद् द्वारा भव्य रुप से तुलसी जयंती मनाई गई । कार्यक्रम में प्रमुख अतिथी श्री विश्वनाथ साह थे । एवं मुख्य प्रवचन कर्ता मानस मर्मज्ञ विद्वान प्रो. रामाश्रय प्रसाद सिंह (अवकाश प्राप्त अध्यक्ष हिन्दी विभाग) एम एस कालेज मोतिहारी (भारत) से पधारे थे । कार्यक्रम का प्रारंभ द्वीप प्रज्वलन से हुआ । श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन के सस्वर मधुर गायन से कार्यक्रम की शुरुवात की गई ।
स्वागत भाषण करते हुए ठाकुर राम क्याम्पस के हिन्दी के प्राध्यायपक प्रो. सचिच्दानन्द सिंह ने बडे ही सारगर्मित शब्दों में बिषय को रखा । राम चरित मानस हिन्दी के विकास मे इसका बडा योगदान रहा है और रहेगा । नेपाल में हिन्दी के सर्न्दर्भ में बोलते हुए बडी साफगोई से कहा कि हिन्दी को राजकीय मान्यता मिले न मिल, संविधान में स्थान मिले न मिले, हिन्दी तो पुरे नेपाल की उसके हृदयों को जोडने वाली भाषा है और रहेगी । इसे कोई मिटा नहीं सकता, वास्तव में यह नेपाल की राष्ट्रभाषा भले ही न हो लेकिन राष्ट्रिय संवाद की भाषा है । इसे झुठलाना नहीं चाहिए । हिन्दी राजकीय मान्यता की मोहताज नहीं है । यह स्वयं विकसित विस्तारित होती रहेगी।
इसके पश्चात मधुकरकंठी कवि श्री राम पुकार सिंह तुलसी रचित भजन का मीठे स्वर में गायन कर श्रोताओं को बांधने में पुरी तरह सफल रहे । श्री इन्द्रदेव कुवंर ने जिंदगी मौत से बेहतर लगी कविता पढकर वाह वाही लुटी ।
तुलसी जयंती के इस उपलक्ष्य पर मोतिहारी से आए मानस मर्मज्ञ रामायण को समर्पित व्यक्तित्व प्रा. रामश्रय प्रसाद सिंह ने ८० के होते हुए भी बडी ओजपुर्णॅ और खोजपुर्ण व्याख्या से श्रोताओ के हृदय में सीधे प्रविष्ट कर गए । उन्होने कहा कि संत तुलसी दास ने राम चरित मानस की रचना की, राम चरित्र मानस की नहीं । क्योंकि चरित में सर्वोगपुर्ण वर्णन होता है । साहित्य और संस्कृति के समाप्त होने से राष्ट्र समाप्त हो जाता है । ५०० बर्षो के बाद श्री तुलसी अमर है । तुलसी दास जी १२ ग्रन्थो की मुख्य रुप से रचना की । आज की मनोदशा का यथार्थ चित्र उन्होने उसी समय खींचा था । आज सज्जन चिंताग्रस्त है, लेकिन खल कुटिल हंसी हंस रहा है ।
उन्होने कहा कि रामायण बडे बूढों के लिए नहीं बल्कि युवाओं के लिए है । एक उदाहरण देते हुए समझाया की रेल्वे स्टेशन पर एक बुजुर्ग रामचरित पढ रहे थे । एक युवा दम्पति ने व्यंगपुर्णॅ लहजे मे कहा की यह कोई स्टेशन पर पढने की चीज है । कुछ देर बाद ट्रेन मे उस युवक को चिल्लाते देख उन्होन कारण पुछा तो उसने बताया की उनकी पत्नी स्टेशन पर ही छुट गई है । इस पर बुजुर्ग ने कहा की अगर रामचरित पढते तो एसा न होता । फिर उनहोने एक चौपाई दिखाई जिसमे लिखा था ....प्रिया चढाई चढे रघुराई....। यानी रामचन्द्र्जी पत्नी को चढा कर फिर खुद चढे ।
उन्होने बल देकर कहा कि विनय पत्रिका का ५६, ५७ और ५८ वें पद का पठन होना चाहिए । यह रामायण की कुंजी है । संसार के प्रति मोह का प्रतीक रावण है । दशाशीष मोह का प्रतीक है । कुभंकर्ण अहंकार का प्रतीक है । मेंघनाद काम का प्रतीक है । इसी प्रकार राम ज्ञान के, लक्ष्मण वैराग्य के और सीता भक्ति की प्रतीक है । उन्होने कहा की भक्ती तो मात समान है । वैराग्य और ज्ञान इसके पुत्र है ।
मानस के दैनिक पाठ का उन्होने आग्रह किया । उन्होने मानस की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमे तीन बडा महत्व है । तीन नगर है, जनकपुर विदेह ज्ञान का अयोध्या व्यवहार का क्षेत्र और लंका देह भौतिकता का क्षेत्र है । मानस की तीन नारियो का उल्लेख करते हुए बताया कि ये कौशल्या, सुमित्रा और कैकैयी । मंथरा लोभ, शर्ुपर्नखा काम और ताडका क्रोध का प्रतिनिधित्व करती है । काम क्रोध लोभ ने संसार को वश में कर रखा है । राम ने पहला बध क्रोध ताडका का किया, जैसे कृष्ण ने पूतना का किया । मंथरा लोभ का प्रतीक है । अतः लोभ नियंत्रित हो । शुपर्नखा के बडे बडे नख थे जो कि काम का उपादान है । अतः नख काटने का चलन है । नाक और कान भी वासना के उपादान है । अतः उसके नाक और कान काटे गए ।
तुलसी दास ने आम लोगो को मनोगत की बात कही है । वशिष्ट के द्वारा निषाद का अभिवादन राम निषाद मिलन, सबरी के जुठे बैर खाना यह समाजिक भेदभाव को मिटाकर समरसता प्रेम सदभाव निर्माण करने का हेतु तुलसी का था । उन्होने स्पष्ट कहा कि रामायण तो एक सेतु की तरह है जो खाई को पाटता भी है और जोडता भी । तुलसी का व्यक्तित्व सेतु व्यक्तित्व है । शासको एवं नेताओं को सेतु समान व्यक्तित्व वाला होना चाहिए । राम ने केवल दिया । आज की तरह केवल लेने वाला नेता नहीं थे । अंत में उन्होने कहा कि आज वास्तव में चरित्र में बदलाव की आवश्यकता है ।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में रक्सौल के कवि ब्रजेश लटपट ने "हिन्द और नैपाल की पहचान है तुलसी" कविता खूब सराही गई । गोपाल अश्क ने गजल और लाला माघवेन्द्र ने रामविवाह प्रसंग एवं कविता पाठ किया । सतीश सजल ने भी कविता पाठ किया । कार्यक्रम समापन में मुख्य अतिथी श्री विश्वनाथ साह ने संबोधित किया । कमलेश त्रिपाठी ने भी अंतिम समय में कविता वाचन किया । धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी साहित्य परिषद् के अध्यक्ष ओम प्रकाश सिकारिया ने किया । उन्होने कहा कि तुलसी के काल मे बडे बडे सेठ और राजा रहे होगे लेकिन ५०० साल बाद संत तुलसी की जयंती मनाई जा रही है । अतः ५०० साल बाद भी आज के किसी अपरिग्रही संत की जयंती मनाई जाएगी न की किसी नेता या धनवान की ।
Tuesday, July 22, 2008
वीरगंज में हास्य-कवि सम्मेलन
बीरगंज (नेपाल) १५ मार्च । नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद्, वीरगंज होली के अवसर पर एक हास्य कवि सम्मेलन का भव्य एवं सफल आयोजन १६ मार्च को वीरगंज उद्योग बाणिज्य संघ के सभाकक्ष में किया । इस कार्यक्रम का सभापतित्व परिषद् के अध्यक्ष श्री ओम प्रकाश सिकारिया ने किया जबकि मुख्य अतिथि त्रिभुवन विश्वविद्यालय केन्द्रीय हिन्दी विभाग के भूतपुर्व अध्यक्ष एवं रचनाकार डा. सुर्ययदेव सिंह प्रभाकर थे । श्री प्रभाकर उम्र के ऐसे पडाव पर है जहां शरीर के अंगो पर व्यक्ति का पुरा नियन्त्रण नहीं रह पाता, इसके बावजूद उन्होने न केवल अपनी उपस्थिती दी बल्कि आद्योपान्त कार्यक्रम का आनन्द भी लिया और उपस्थित श्रोताओं को सम्बोधित भी किया ।
इस हास्य कवि सम्मेलन के उद्घाटन एवं समापन सत्र का संचालन परिषद् के सचिव एवं युवा गीतकार सतीशचन्द्र झा "सजल" ने किया जबकि कविता वाचन सत्र का संचालन प्रख्यात लटपट ब्रजेश ने किया । कार्यक्रम का प्रारम्भ गोरख मस्ताना के हिन्दी और भोजपुरी मुक्तकों से हुआ । उन्होंने महान व्यक्तित्वों के विस्मरण एवं उपेक्षा पर व्यंग्य किया और अपनी व्यंगयोंक्तियों से श्रोताओं का भरपुर मनोरंजन किया । जगलकार जय प्रकाश पुष्प ने नेपाल की वर्तमान अवस्था को महाराष्ट्र के प्रसंग से जोडते हुए सीमांचल के राजनैतिक यथार्थ का चित्रण किया । इन्द्रदेव कुंवर ने बृद्ध माता पिता की बर्तमान परिवार में विवशतापुर्ण अवस्था की झलक प्रस्तुत की और रहम को बुढापे की विवशता के रुप में चित्रित कर श्रोताओं को प्रभावित किया । प्रसाद रत्नेश्वर ने एक ओर अपनी छोटी-छोटी व्यंगोक्तियों से लोगों को गुदगुदाया । खादी ग्रामोद्योग पर गम्भीरता पुर्वक टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि खादी वस्त्र नहीं एक विचार है, इसलिए यस उद्योग बिमार है ।
उनके अतिरिक्त इस कार्यक्रम में संतोष दिवाकर, सुधीर झा, ललन प्रसाद नलिन, धर्मेन्द्र भट्टर्राई, गोपाल अश्क, पूनम झा, रामस्वार्थ ठाकुर, धनुषधारी कुशवाहा ने अपनी हास्यपरक कविताओं से श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया । स्थानीय कवि लाला माधवेन्द्र ने अपनी हास्यपरक कविता "मछली रानी" की अभिनयात्मक प्रस्तुति से लोगों को मंत्र-मुग्ध कर दिया ।
इस कार्यक्रम का र्सवाधिक आकर्षा "हिन्द युग्म डाट कम" (इन्टरनेट मैगजिन) दिल्ली से पधारे युवा व्यंग्यकार भूपेन्द्र राघव और हिन्दी के चर्चित गीतकार, व्यंग्यकार और राष्ट्रीय मंच संचालक डा". कृष्णावतार राही थे । श्री राघव ने अपने छोटे-छोटे व्यंग्यात्मक मुक्तकों से श्रोताओं को प्रभावित किया और डा". राही ने लगभग एक घंटे तक पूरे सभाकक्ष को हास्य की फुहार में भीगकर खुद ही खोने के लिए विवश कर दिया । उनके व्यंग्य का बिषय राजनीति के साथ-साथ आधूनिक युग की महिलाएं बनी और बिशेषता यह कि कार्यक्रम में सहभागी दोनों ही वर्ग के लोग तालियां पीटते देखे गए । इस कार्यक्रम का संयोजन कुमार सच्चिदानंद ने किया ।
यस कवि सम्मेलन अनेक अर्थो में खास था क्योंकि इसके लिए श्रोत और संसाधन जुटाने का कार्य परिषद् ने अपने बलबूते पर किया और सीमित स्रोत तथा संसाधन के बावजुद स्थानीय रचनाकारों के साथ-साथ दूर-दराज के रचनाकारों भी इसमें सहभागिता करायी गयी । इस कार्यक्रम में श्रोताओं की व्यापक सहभागिता थी और लगभग पाँच घंटे तक उन्होंने हास्य और व्यंग्य के तेज छीटों का आनन्द लिया । यस कार्यक्रम इसलिए भी रेखांकनीय रहा क्योंकि इसमें शहर के आम लोगों के साथ-साथ विभिन्न वर्गो के विशिष्ट व्यक्तियों की उपस्थिति रही ।
इस कार्यक्रम के साथ सबसे बडी विडम्बना यह घंटित हुइ कि स्थानीय एवं राष्ट्रीय नेपाली संचार माध्यमों के प्रतिनिधियों को औपचारिक सूचना एवं निमंत्रण के बावजूद दोनों ही स्तरों पर इस कार्यक्रम को तरजीह नहीं दिया गया । शायद इसलिए क्योंकि यस हिन्दी का कार्यक्रम था । स्थानीय स्तर पर प्रशासन के आला अधिकारियों को भी निमंत्रित किया गया लेकिन उनकी भी उपस्थिति नगण्य थी और निमंत्रण के बावजूद हिन्दी के नाम पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजक बने भारतीय वाणिज्य महादूतावास वीरगंज से भी किसी का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया था ।
कुल मिलाकर वीरगंज में यस साहित्यिक आयोजन चर्चा का बिषय रहा । हिन्दी के इस मंच पर भोजपुरी और मैथिली की भी रचनाएं पढी गयी । इसके माध्यम से नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद् ने नेपाल में नागरी लिपि प्रयोग करने वाली भाषाओं के बीच सुमधुर सेतु के निर्माण की दिशा में महत्वपुर्ण कार्य किया और नेपाल में हिन्दी के प्रति टूटी-बिखरी संवेदना को संग्रहित करने की दिशा में एक महत्वपुर्ण कदम बढाया । (साभार: हिमालिनी)
Sunday, July 20, 2008
बीरगंज मे बाल कविता प्रतियोगिता सम्पन्न
बीरगंज जनवरी १२ । नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद कक्षा ८ से १० तक के विधार्थीयों का पर्सा जिल्ला स्तरीय बाल कविता प्रतियोगिता आयोजना कराया । उधोग बाणिज्य संध हल मे आयोजित उक्त प्रतियोगिता में विभिन्न स्कुल के २१ विधार्थीयों ने भाग लिया । उक्त प्रतियोगिता मे प्रथम पुरस्कार दिल्ली पब्लीक स्कुल की सुरम्या शुभम ने प्राप्त किया, द्धितिय पुरस्कार डिएभी पब्लीक स्कुल की ऐश्वर्या भट्ट तथा तृतीय पुरस्कार दिल्ली पब्लीक स्कुल की आसियाना ने प्राप्त किया । अंशुमन आलोक, लक्की कुमारी (सेंटजेवीयर स्कुल), सुकन्या, निकीता क्याल (डिएभी पब्लीक स्कुल), बेबी र्सराफ (नेपाल रेल्वे मा वि), बिरेन्द्र कुमार मिश्र (महानन्द प्रसाद उ मा वि) तथा ज्योति शर्मा (माइस्थान विधापीठ) ने सान्तावना पुरस्कार प्राप्त किया । कार्यक्रम मे वरिष्ठ कवि इन्द्रदेव सिंह, डा० लटपट ब्रजेश, डा० विशम्भर शर्मा, चन्द्रकिशोर झा, गोपाल अश्क आदि नै शुभकामना देते हुए कविता पाठ किया । कार्यक्रम का सभापतित्व परिषद के अध्यक्ष ओमप्रकाश सिकरिया तथा संचालन सतिश चन्द्र सजल जी ने किया । छात्र छात्राओं की कविता लेखन प्रतिभा खोज कर प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उक्त कार्यक्रम आयोजित किया गया । मेरा देश, माँ एवम शरद ऋतु समेत तीन विषयों पर बालको की भावना कविता मे सुन कर श्रोतागण मुग्ध हो गए थें।
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